ये ब्लॉग नारी की बुरी स्थिति के विचार पर है -
नारी को देवी और महान माँ का दर्जा देने वाले समाज में उसकी स्थिति शोचनीय क्यों है? बलात्कार की घटनाये सहज हैं और उसका सारा अपमान सिर्फ नारी के हिस्से में है? दहेज़ के लिए जब कोई नारी मार दी जाती है तो दोष उसके पिता का है उसने अपनी बेटी के लिए क्यों नहीं जोड़ा पैसा? ऊपर से तो लोग बाते न्याय की करते हैं पर भारतीय समाज नारी को ही हर तरह दोष देने की नीति पर चलता है
यहां समाज का विभाजन लिंग पैर आधारित है और उसी के हिसाब से व्यक्ति का जीवन निर्धारण होता है. यदि पुरुष है तो पिता की संपत्ति का अधिकारी है महिला है तो उसके हिस्से में घर का काम है और अगर थर्ड जेंडर है तो समाज से बहार है ? सबसे ज्यादा सम्मान अधिकार और महत्व पुरुष के लिए है महिला का जीवन भी और शरीर भी पुरुष के ही लिए है ये असमानता से बना हुआ सामाजिक ढांचा कैसे किसी तरह से न्याय को सपोर्ट कर सकता है?
जब जड़ ही अन्याय पर बनी है तो समाज में न्याय का कोई सम्मान या स्थान ही नहीं है|
पुरुष शरीर और बल से ताकतवर है स्त्री कमजोर है
शिक्षा भी पुरुष सदियों से हासिल कर रहे हैं और स्त्री की शिक्षा का कोई महत्व नहीं है उनकी शिक्षा को ज्यादातर लोग उपहासित करते है ऍम ए वाली बहु की रोटी कैसी है ? तुम्हारी बीवी तुमसे ज्यादा पढ़ी है तुमको नौकर बना के रखती होगी? ये सब मज़ाक असलियत में सोच से निकले हैं स्त्री को हर हाल में पुरुष से नीचे का दर्जा दिया जाता है
एक प्रश्न दिमाग में आता है क्या लिंग किसी व्यक्ति की प्रतिभा बुद्धि और अधिकार को निर्धारित करने का पैमाना हो सकता है? लिंग तो केवल एक जननं अंग है? कोई दिमाग नहीं है जो प्रतिभा बुद्धि का पैमाना बने???
कृपया जो भी इस ब्लॉग को पढ़े अपने विचार दे की सामाजिक वभाजन का पैमाना क्या होना चाहिए??
नारी को देवी और महान माँ का दर्जा देने वाले समाज में उसकी स्थिति शोचनीय क्यों है? बलात्कार की घटनाये सहज हैं और उसका सारा अपमान सिर्फ नारी के हिस्से में है? दहेज़ के लिए जब कोई नारी मार दी जाती है तो दोष उसके पिता का है उसने अपनी बेटी के लिए क्यों नहीं जोड़ा पैसा? ऊपर से तो लोग बाते न्याय की करते हैं पर भारतीय समाज नारी को ही हर तरह दोष देने की नीति पर चलता है
यहां समाज का विभाजन लिंग पैर आधारित है और उसी के हिसाब से व्यक्ति का जीवन निर्धारण होता है. यदि पुरुष है तो पिता की संपत्ति का अधिकारी है महिला है तो उसके हिस्से में घर का काम है और अगर थर्ड जेंडर है तो समाज से बहार है ? सबसे ज्यादा सम्मान अधिकार और महत्व पुरुष के लिए है महिला का जीवन भी और शरीर भी पुरुष के ही लिए है ये असमानता से बना हुआ सामाजिक ढांचा कैसे किसी तरह से न्याय को सपोर्ट कर सकता है?
जब जड़ ही अन्याय पर बनी है तो समाज में न्याय का कोई सम्मान या स्थान ही नहीं है|
पुरुष शरीर और बल से ताकतवर है स्त्री कमजोर है
शिक्षा भी पुरुष सदियों से हासिल कर रहे हैं और स्त्री की शिक्षा का कोई महत्व नहीं है उनकी शिक्षा को ज्यादातर लोग उपहासित करते है ऍम ए वाली बहु की रोटी कैसी है ? तुम्हारी बीवी तुमसे ज्यादा पढ़ी है तुमको नौकर बना के रखती होगी? ये सब मज़ाक असलियत में सोच से निकले हैं स्त्री को हर हाल में पुरुष से नीचे का दर्जा दिया जाता है
एक प्रश्न दिमाग में आता है क्या लिंग किसी व्यक्ति की प्रतिभा बुद्धि और अधिकार को निर्धारित करने का पैमाना हो सकता है? लिंग तो केवल एक जननं अंग है? कोई दिमाग नहीं है जो प्रतिभा बुद्धि का पैमाना बने???
कृपया जो भी इस ब्लॉग को पढ़े अपने विचार दे की सामाजिक वभाजन का पैमाना क्या होना चाहिए??
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